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हाथरस केस ( Hathras case ) : पीडि़ता का अंतिम संस्कार रात के अंधेरे में आनन-फानन में किया गया ?
हाथरस केस : अंतिम संस्कार भी रात के अंधेरे में आनन-फानन में
हाथरस केस में 19 साल की लड़की के साथ पहले अन्याय होता है,उसका उत्पीड़न करने वालों पर पुलिस पहले कठोर एक्शन नहीं करती, पुलिस को पूरे मामलें में विवेचना और रिपोर्ट लिखने में ही 10 दिन का समय लग जाता है । जब पीडि़ता का निधन हो जाता है तो पुलिस और प्रशासन अंतिम संस्कार भी रात के अंधेरे में आनन-फानन में कर देता है । जब मीडिया सवाल करता है कि आखिर ऐस क्यों किया गया तो पुलिस प्रशासन मौन साध लेता है । सवाल उठता है आखिर क्यों ? आधी रात को परिवार की मर्जी के बिना पीडि़ता का अंतिम संस्कार कर दिया जाता है ? कानून की कौन सी किताब पढ़कर अफसर बनें हो हाथरस के डीएम साहब ?
हाथरस की पीडि़ता के परिवार का दर्द और संवेदन हीन पुलिस प्रशासन
पीडि़ता के भाई ने मीडिया से बात करते हुए खुद कहा है कि परिवार रात को अंतिम संस्कार नहीं करना चाहता था, लेकिन डीएम साहब ने कहा की आप लोग राजनीति कर रहे हैं। चलिए मान लिया की आप डीएम है, बोल सकते हैं लेकिन ये तो बता दीजिए की यह कहां के लोकतंत्र में लिखा है कि किसी पीडि़ता के परिवार को अंतिम सस्कार करने के लिए पुलिस दबाव बनाए, डराए धमकाए ? मीडिया रिपोर्ट में जो वीडियो आ रहे हैं वह साफ बताते हैं कि आधी रात को अंतिम संस्कार करने से इंकार करने पर हाथरस की पुलिस पीडि़ता के परिवार के साथ गलत तरीके से व्यवहार किया है । आखिर क्यों ? क्या पुलिस के लोगों को कानून का डर नहीं लगता या यह मानकर यूपी पुलिस चलती है कि सरकार के आदेश का पालन कानून से परे जाकर भी करना है ?
क्या स्कूल की किताब का सबक याद नहीं रहा ? या जिस कठिन प्रतियोगी परीक्षा को पास करने के बाद आप यहां तक पहुंचे हो उसके सबक एक पल में भूल गए ? या सिस्टम इतना सड़ चुका है कि ट्रेनिंग के दौरान एक अफसर के समाज के प्रति जो दायित्व बताए जाते हैं और जो संविधान आपको ताकत देता है वह भी याद नहीं रहता ।
हाथरस की पीडि़ता को जिंदा रहते तो न्याय नहीं दे पाए और ना ही उसका जीवन बचा पाने में सिस्टम सफल रहा, कम से कम अंतिम संस्कार का अधिकार तो परिवार को दे दिया जाता । 9 माह जिस माह ने आपनी बेटी को खोक में रखने के बाद जन्म दिया हो,उसके बचपन को संवारा हो कम से कम उसे अपनी बेटी का अंतिम संस्कार तो कर लेने देते, कम से कम एक अंतिम बार, एक मां को उसकी लाडली का चेहरा देख लेने देते ।
मीडिया से बात करते हुए पीडि़ता की मां ने खुद कहा है कि वह अपनी बेटी की अंतिम विदाई दिन में अपने घर से करना चाहती थी, एक मां को क्या आपका सिस्टम इतना अधिकार भी नहीं दे सकता । किस बात के एसपी और डीएम हो आप लोग ? जनता के सेवक होने का दम भरने वाली अफसर शाही का इतना पतन हो चुका है कि जरा सी संवेदना नहीं बची ।
यूपी में अफसर शाही बेलगाम हो चुकी है
दरअसल यूपी में अफसर शाही बेलगाम हो चुकी है, कुछ अफसरों को छोड़ दिया जाए तो 90 फीसदी ऑफिसर कथित ईगो से भरपूर केवल आम आदमी पर अपनी शक्ति का अधिकार दिखाते हैं, ये और केवल सत्ता की हनक के वफादार होते हैं । इन लोगों से न्याय की उम्मीद करना ही बेकार है ।
जहां तक राजनेतओं की बात है तो सरकारें आती-जाती रहती है और राजनेताओं से जनता उम्मीद करती है कि उनके सुख दु:ख को वह कम से कम समझेंगे । लेकिन सच तो यह है कि लोकतंत्र में सेवा के नाम पर आने वाले राजनेता जितना अच्छा राजनीति का गुणा भाग आजकल कर लेते हैं, उतना अच्छा काम इनके बस का नहीं हैं और ना ये लोग करता चाहते हैं । फिर वह सरकार यूपी में किसी भी दल की क्यों ना हो ? जाति और धर्म के नाम पर पिछले 30 साल की राजनीति ने यूपी की जनता को केवल छला है ।
हाथरस में अगर आज कुछ नहीं है तो कानून का राज
समाज और राजनीति में अपराधियों और बाहुबलियों का बोलबाला बहुत ज्याद बढ़ चुका है, और यही इस समय का सबसे बड़ा सच है । ऐसा कोई राजनीतिक दल नहीं है जहां अपराधी विधायक या एमएलए नहीं हो । वह समय गया जब लोग अपने पद की गरिमा का ध्यान रखते हुए काम करते थे,आज धनबल और राजनीति में अपनी पहुंच के दम पर मनचाही जगह अपनी तैनाती कराने में सफल हो जाते हैं । ऐसे में एक गरीब आदमी सिस्टम से न्याय की उम्मीद करें भी तौ कैसे?
भारत की एक बेटी का रेप-क़त्ल किया जाता है, तथ्य दबाए जाते हैं और अन्त में उसके परिवार से अंतिम संस्कार का हक़ भी छीन लिया जाता है।
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) September 30, 2020
ये अपमानजनक और अन्यायपूर्ण है।#HathrasHorrorShocksIndia pic.twitter.com/SusyKV6CfE
कहने को सरकार है,डीएम और दरोगा है लेकिन हाथरस में अगर आज कुछ नहीं है तो कानून का राज । हाथरस में अब 19 साल की पीडि़ता नहीं है, जिसके अपने कुछ सपने थे ।
...तो फिर हाथरस में अब बचा क्या है ?
तो फिर हाथरस में अब बचा क्या है ? पीडि़ता के परिवार का न भूलने वाला दर्द, एक मां की चित्कार और पीडि़ता के कुछ सवाल कि आखिर उसका कसूर क्या था ? क्या लड़की होना ही उसका कसूर है ? या फिर एक दलित कमजोर गरीब किसान की बेटी होना ? आखिर कानून और समाज उसके लिए बेहतर सुरक्षित माहौल क्यों नहीं दे पाया ? और सबसे बड़ा सवाल क्या आरोपियों को उनके गुनाह की सजा हमारा कानून और न्याय तंत्र समय रहते कठोर से कठोर सजा दे भी पाएगा या नहीं ?

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