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घास की रोटी खा रहे लोगों की आवाज हमारी संसद में गूंजती क्‍यों नहीं ?




            
भाजपा आपातकाल के युग की चर्चा को भूल नहीं पाती और कांग्रेस नेहरु युग से आगे बढ़ती नहीं दिखती,लेकिन यह देश आगे बढ़ना चाहता है, विकास की पटरी पर सरपट भागना चाहता है,लेकिन क्‍या वर्तमान राजनीति हालात में यह संभव है ? यक्ष प्रश्‍न है ? जिसका उत्‍तर इस देश के सवा सौ करोड़ लोगों के साथ, मार्केट और भारत में संभावना की तलाश करते अमेरिका,चीन,ब्राजील जैसे तमाम देशों के दिग्‍गज उद़योगपतियों को भी है।

गूगल,फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां पीएम मोदी के डिजिटल इंडिया अभियान को सफल बनाने के लिए आगे आए हैं,मोदी के विदेश यात्राओं ने भी ब्रांड इंडिया को मजबूत किया है,लेकिन आर्थिक मोर्चे पर अभी भी सवालिया निशान बना हुआ है। इन सब बातों के बीच बुंदलेखंड को लेकर आया एक सर्वे बताता है कि गरीबी और भूख से परेशान लोग घास की रोटियां खा रहे हैं
? सवाल उठता है आखिर क्‍यों? घास की रोटी खा रहे लोगों की आवाज हमारी संसद में गूंजती क्‍यों नहीं ?  क्‍या यह केवल बुंदेलखंड की पीड़ा है,जी नहीं यह देश की पीड़ा है, हर भारतीय का दर्द, तो फिर मिलकर बांटते क्‍यों नहीं?


संसद में दो दिन का राजनीतिक माहौल,सविंधान पर रोचक चर्चा के बाद पीएम मोदी और कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी की मुलाकात उम्‍मीद तो जगाती है,जीएसटी पर कुछ कदम कांग्रेस आगे बढ़ी है,संभव है मोदी सरकार भी सकारात्‍मक रुख दिखाएं और बात बन जाए। अगर ऐसा होता है तो लोकतंत्र के लिए इससे बेहतरीन बात क्‍या होगी। अगर जीएसटी पास होता है तो  देश में एक ही रेट पर टैक्‍स लगेगा। लेकिन क्‍या ऐसा ही भूमि अधिग्रहण बिल सहित अन्‍य जरूरी बिल पर विपक्ष का सहयोग मोदी सरकार को मिल सकेगा? उम्‍मीद है,ऐसा होगा, होनी भी चाहिए,लोकतंत्र के सबसे बड़े महापर्व कहे जाने वाले चुनाव में करोड़ों मतदाताओं ने यहीं सोचकर तो माननीय सांसदों को लोकतंत्र की चौखट पर भेजा है।

लेकिन डर उस वक्‍त बढ़ता है जब भाजपा थर्ड रीख
(जर्मनी में हिटलर के शासन) की मिसाल देते हुए आपातकाल की याद दिलाते हुए कांग्रेस पर हमला करती है, और कांग्रेस नेहरु के कंधे के सहारे सहिष्‍णुता की जुबानी बंदूक चलाती है,बहस का यहीं माहौल संकेत देता है कि संसद में सरकार और विपक्ष कभी भी आमने-सामने आ सकते हैं। कोटा में छात्रों का आत्‍महत्‍या करने का दौर थम नहीं रहा, बुंदेलखंड में भूख और गरीबी का आलम यह है कि लोग घास की रोटियां खा रहे हैं, उड़ीसा और महाराष्‍ट्र में किसान आत्‍महत्‍या कर रहे हैं, क्‍या इन बातों से हमारे सांसदो को विचलित नहीं होना चाहिए ? बिल्‍कुल होना चाहिए, जवान मौत पर दर्द तो छलकना ही चाहिए,युवा सपनों का यूं मर जाना दिल को दु:ख देता है।

लोकतंत्र के मंदिर में कानून और विकास की बातों के साथ,आम आदमी को राहत पहुंचाने के लिए चर्चा कर रास्‍ता निकालने का प्रयास जरूर होना चाहिए।
चुनावों से आगे निकलकर आइडिया ऑफ इंडिया पर क्‍या एक सोच के साथ हमारे नेता आगे बढ़ सकेंगे ? इस सवाल का जवाब तो आने वाले दिनों मैं हमें पता चल ही जाएगा। राजनीति में जो कहा जाता है वह होता नहीं, हालांकि संकेतों की भाषा मैं बहुत कुछ बदल रहा है।

RAJESH YADAV

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