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यमला पगला दीवाना : फुल टू मनोरंजन का धमाल



निर्देशक : समीर कार्णिक


निर्माता : समीर कार्णिक, नितिन मनमोहन


कलाकार : धर्मेद्र , सनी देओल, बॉबी देओल, कुलराज रंधावा, नफीसा अली, अनुपम खेर


पटकथा : जसविंदर बाथ


कोरियोग्राफर : बास्को सीजर


संगीत : लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आरडीबी, अनु मलिक, संदेश शांडिल्य


रेटिंग :


आज शुक्रवार को रिलीज हुई यमला पगला दीवाना मनोरंजन के लिहाज से बेहतर फिल्म है। निर्देशक समीर कार्णिक ने हॉस्य से भरपूर फिल्म बनाई है। फिल्म में धर्मेद्र, सन्नी देओल और बॉबी देओल को एक साथ कॉमेडी करते हुए देखना रोचक है। देओल तिकड़ी, दो ऑयटम सांग और हॉस्य का भरपूर डोज इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर सफल बना सकता है। लेकिन इन सकारात्मक बातों के साथ इस फिल्म में नयापन नहीं के बराबर है और फिल्म का पहला भाग कुछ कमजोर है। मध्यांतर के बाद फिल्म अपनी रफ्तार से आगे बढ़ती है जिसमें हॉस्य के फुल डोज के साथ रोमांस और भावनात्मक मोड़ भी दर्शको को देखने को मिलता है। फिल्म देखते समय कई बार आपको बॉलीवुड की कुछ पुरानी फिल्मों के गीत और कहानी का ट्रीटमेंट याद आ सकते हैं।


यमला पगला दीवाना एक परिवार के बिछड़ने और मिलने की कहानी है। इस थीम पर इससे पहले भी कई फिल्में बन चुकी है लेकिन इस फिल्म के चरित्रों को धर्मेद्र, सन्नी देओल और बॉबी देओल को ध्यान में रखकर लिखा गया है। फिल्म की शुरूआत कनाडा में रह रहे परमवीर सिंह (सन्नी देओल) से होती है । अपने पिता और भाई की खोज में परमवीर भारत आता है और बनारस में उसकी मुलाकात अपने भाई गजोधर (बॉबी देओल) और पिता धरमवीर (धर्मेद्र )से होती है। दोनों ही बनारस के बहुत नामी ठग रहते है और शुरू में तो वे परमवीर को भी झांसा दे देते है। लेकिन परमवीर धीरे -धीरे उनसे रिश्ता जोड़कर उनको सही रास्ते पर लाने का प्रयास करता है। इसी बीच गजोधर को बनारस पर किताब लिखने के लिए पंजाब से आई साहिबां से मोहब्बत हो जाती है। लेकिन साहिबां के भाईयों को यह बात नागवार गुजरती है। साहिबां और गजोधर को मिलाप कराने का वादा परमवीर करता है और दोनों पंजाब पहुंच जाते हैं। कहानी का उतार चढ़ाव कुछ इस तरह से चलता है कि साहिबा और गजोधर को एक कराने की इस कहानी में परमवीर का पूरा परिवार आपस में मिल जाता है।


निर्देशक समीर कार्णिक ने बाप बेटे की कैमेस्ट्री को बेजोड़ अंदाज में फिल्माया है लेकिन फिल्म की लंबाई थोड़ी अधिक हो गई है। जसविंदर बाथ ने पटकथा तो बेहतर लिखी है लेकिन फिल्म का संपदान कमजोर हो जाने से फिल्म पहले भाग में कई जगह बोझिल सी हो जाती है। साहिबां के रोल में कुलराज रंधावा ने बेहतर अभिनय किया है और वे बड़े परदे पर अपना जादू चला सकती है।


अगर आप धर्मेद्र, सन्नी देओल और बॉबी देओल की फिल्में पसंद करते हैं तो इस फिल्म को देख सकते हैं। हॉस्य से भरपूर इस फिल्म को देखते समय ज्यादा दिमाग न लगाए वरना आपको निराशा हो सकती है। फिल्म की कहानी साधारण लेकिन प्रस्तुतीकरण मनोरंजन से भरपूर होने के चलते पूरे परिवार के साथ आप इस फिल्म को देख सकते हैं।


राजेश यादव

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