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एक रिवाज सी बन गई हैं जिंदगी...


एक‍ रिवाज सी बन गई हैं जिंदगी
सुबह शाम और दोपहर..
धूप का एक टुकड़ा, गोधुली बेला का गोरापन,
रात की चांदनी संग,
मेरा बिखरा हुआ मन
सपनों के साथ उठता
सपनों के साथ दौड़ता
और खामोश रात में
चुपके से बिस्‍तर में दुबक जाता,
हर रोज.. जितना जीता उतना ही मरता मेरा मन
छोड़ जाता है कुछ सवाल,
हर अधूरी बात की तरह,
और मैं खामोश हो ...
हर बार उसे सुनता रह जाता हूं,
इसलिए तो कहता हूं,
एक‍ रिवाज सी बन गई हैं जिंदगी,
* * **
ये माना की मेरा जीना तुम्‍हारे जीने से जुदा है...
पर मेरे रूह में कैद उस किताब का क्‍या ?
जिसके पहले पन्‍ने पर तुम्‍हारा नाम है..
मेरे रिवाजों में तुम, दिल की किताब में तुम,
कुछ लोग इसे मोहब्‍बत कहते हैं,
कुछ लोग इसे जिंदगी,
मेरे लिए तो बस एक खूबसूरत किताब की तरह हो..
जिसकी कहानियों में तुम,
जिसकी रवानियों में तुम,
किताब के बीच वो जो रंगीन सा पन्‍ना है..
उसमें छिपा है,
बिखरे हुए पन्‍नों के बीच तुम्‍हारी बातों का जादू,
जितना पढ़ता हूं उतना जीता हूं, उतनी ही बार मरता हूं,
इसलिए तो कहता हूं ...
एक रिवाज सी बन गई हैं जिंदगी...


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