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फोटोग्राफी डे : WHO IS BEHIND THE CAMERA ?

spacial blog post World Photography Day: 



आज पूरे विश्व में वर्ल्ड फोटोग्राफी डे मनाया जा रहा है, और कैमरे के लेंस और मानवीय विचार के मेल से अब तक अनगिनत फोटो के संसार ने मानव मन को छूआ है।  फोटोग्राफी डे के 175 साल आज पूरे हो चुके हैं। यूं तो एक जर्नलिस्ट होने के चलते कई फोटोग्राफरों से रूबरू होने का अवसर मिलता है और सबके काम एक से बड़ कर एक ।

शान बहादुर ऐसे ही फोटोजर्नलिस्ट में से एक हैं। कुछ दिन पहले ही फोटोग्राफी डे पर न्यूज प्लान करते समय शान से चर्चा के दौरान मैने यूं ही पूछ लिया कि एक फोटो को बेहतरीन बनाने के लिए सबसे जरूरी चीज क्‍या है ?  जवाब  में तीन बातें निकलकर कर आई, पहली लेंस जो फोटो एंगल तक पहुंचने के लिए फोटोग्राफर की एप्रोच के लिए सबसे जरूरी है। दूसरा कैमरे की बॉडी, जो फोटो की क्वालिटी तय करने में मह्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। और तीसरी और सबसे जरूरी बात कैमरे के पीछे खड़ा फोटोग्राफर और उसकी सोच, वह जो फोटो लेना चाहता है उसको लेकर उसकी सोच क्‍या है, एक फोटोग्राफर अगर चिडिया की चोंच का फोटो लेना चाहता हैं तो उसे उस पर ही अपना पूरा फोकस करना होगा और कैमेरा के लैंस का एंगल उसे उसकी एप्रोच तक पहुंचने में मददगार होगा।


शान की बात सुनकर मुझे एक फोटोग्राफर की वह पंच लाइन याद आ गई जो यह बताती है कि एक फोटो को लेने के लिए जो सबसे बेहतरीन उपकरण है वह उसकी अपनी आंखें ही हैं बहादुर देश के सबसे अधिक पढ़ें जाने वाले समाचार पत्र दैनिक भास्‍कर के भोपाल संस्करण में कार्यरत है और इन दिनों लाइट फोटोग्राफी और 360 डिग्री फोटोग्राफी को लेकर प्रयोग कर रहे हैं। यूं तो

पापा नहीं चाहते थे कि मैं भी उनकी तरह फोटोग्राफर बनूं
शान अपने घर में फोटोग्राफी के संसार को आगे ले जाने वालों में तीसरी पीढ़ी के फोटोग्राफर है। उनके पिता ज  के. ए. बहादुर जन सर्पक विभाग में फोटोग्राफर रह चुके हैं। शान के दादा जी स्‍व. एस. ए. बहादुर भी फोटोग्राफर थे।

शान बहादुर अपने बचपन के दिन याद करते हुए बताते हैं कि जब वह 12 साल के थे तो फोटोग्राफी को लेकर मन में जिज्ञासा रहती थी और वह अपने पापा के साथ जब कहीं बाहर घूमने के लिए जाते तो तो किसी खूबसूरत फोटो एंगल पर अपने पापा से चर्चा किया करते थे।  उनके पापा कई बार फोटो के बारे में बहुत कुछ बताते थे, लेकिन समय के साथ जैसे जैसे मैं बड़ा होता गया तो पापा नहीं चाहते थे कि मैं भी उनकी तरह फोटोग्राफर बनूं। इसलिए ग्रेजुएशन में कामर्स में प्रवेश दिला दिया गया था। लेकिन मेरे मन के अंदर फोटोग्राफी को लेकर जिज्ञासा हमेशा बनीं रही।

नौकरी लगने के दो दिन बाद घर में सूचना दी
चूंकि पापा नहीं चाहते थे कि मैं उनकी तरह फोटोग्राफी को अपना करियर बनाऊं इसलिए जब दैनिक भास्‍कर में मेरी नौकरी लग गई तो पहले दो दिन इस बात को मैने अपने घर में किसी से इस बात को कहने का साहस नहीं कर पाया था। दो दिन बाद जब मैने अपने पापा से अपने जॉब के बारे में चर्चा की तो वे पहले थोड़ा नाराज हुए लेकिन फिर उन्‍होंने मुझे समझाते हुए कहा बेटा सबसे पहले अपने फील्‍ड को समझना, और इसके बाद ही अपने वर्क को सामने लाना। ऐसा करके ही आप अपना सबसे बेहतरीन काम कर सकते हो । मेरे लिए उनका यह वाक्य एक मंत्र की तरह है।

फोटोजर्नलिज्‍म : समय की कहानी

शान कहते है कि न्यूज के लिए समय पर फोटो देना जितना जरूरी है उतना ही एक बेहतरीन फोटो लेने के लिए बिना कोई अवसर गवांए सही मौके पर फोटो क्लिक करना भी उतना ही जरूरी है। डिजिटल संसार में फोटो में तकनीक का बोलबाला बड़ा है लेकिन एक फोटोजर्नलिस्ट की सही एप्रोच और जमाने के साथ अपडेट रहकर ही इस फील्‍ड में सफलता पाई जा सकती है।  एक बार श्री श्री रविशंकर सुबह 5 बजे भोजपुर के मंदिर आने वाले थे मुझे रात 1 बजे इसकी सूचना वरिष्‍ठ रिपोर्टर द्वारा मिली और कहा गया कि फोटो अपने पास होना ही चाहिए। मैं उस वक्‍त ऑफिस में था वहां से मैं घर गया और अब जब यह तय हो गया था कि आज की रात तो जाग कर ही काटनी है तो रात भोजपुर निकलने से पहले निद्रा देवी से बचने के लिए नहाने का विकल्प चुना और उसके बाद मैं भोजपुर के लिए निकल गया। लेकिन श्री श्री रविशंकर जी सुबह 4 बजे ना आकर दिन में 10.30 आए और उनके एक क्लिक के लिए पूरी रात जगकर काटनी पड़ी। इस फील्‍ड में ऐसा होना आम बात है और इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए।
कई बार ऐसा भी होता है कि एक न्यूज के लिए एक फोटोजर्नलिस्ट जिस एंगल को सबसे बेहतरीन मानता है उसे डेस्क टीम या रिपोर्टर उसे उस नजर से नहीं देखते है, लेकिन यह न्यूज को लेकर अपने अपने विचार का मतभेद है और मीडिया में इन सब बातें बहुत आम है। एक फोटो जब बेहतरीन कैप्शन के साथ रीडर के पास जाता है तो फोटोजर्नलिस्ट और डेस्क टीम का काम अपने आप सारी कहानी कह जाता है। 

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