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फिल्म ‘लूट’ : लचर पटकथा, बेदम आइडिया



रेटिंग : *
निर्देशक : रजनीश राज ठाकुर
निर्माता : सुनील शेट्टी, शब्बीर बॉक्सवाला
कलाकार: गोविंदा,महाअक्षय चक्रवर्ती, सुनील शेट्टी, रवि किशन, श्वेता भारद्वाज, प्रेम चोपड़ा, जावेद जाफरी
संगीत : श्रवण सिन्हा, मीका सिंह, समीर टंडन
बैनर : पापर्कान मोशन पिक्चर ,वॉयकॉम 18 मोशन



युवा निर्देशक रजनीश ठाकुर की फिल्म ‘लूट’ आज सिनेमाघरों में रिलीज हुई है। फिल्म को क्राइम और कॉमेडी का डोज देकर बनाने की कोशिश की गई है । बेदम आइडिए और कमजोर पटकथा के चलते फिल्म दर्शकों का मनोरंजन करने में सफल नजर नहीं आती है। युवा निर्देशक रजनीश राज ठाकुर से कुछ नए पन की उम्मीद थी लेकिन ऐसा लगता है कि बॉलीवुड में मनोरंजन प्रधान स्टोरी आइडिया का टोटा कुछ ज्यादा ही हो गया है। लंबे समय बाद गोविंदा को लूट जैसी फिल्म में देखना उनके प्रसंशकों को निराश करने वाला अनुभव साबित होगा क्योंकि सच तो यह है कि इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो गोविंदा की पुरानी इमेज के आसपास भी हो। मशाला फिल्म के नाम पर कुछ दिअर्थी संवादो का निर्देशक ने सहारा लेने का प्रयास किया है जिससे बचा जा सकता था। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ‘लूट’ का भाग्य खराब नजर आता है।
जहां तक फिल्म की कहानी की बात हैं तो यह चार ऐसे चोरों पंडित (गोविंदा) अकबर (जावेद जाफरी), विलसन (महाक्षय चक्रवर्ती) और बिल्डर (सुनील शेट्टी) पर आधारित है जो अपना काम परफेक्ट ढ़क से नहीं करते हैं। भारत में ये मि. बाटलीवाला के लिए काम करते है और वह उनको बैंकाक एक बड़े मिशन पर चोरी के लिए भेजा जाता है लेकिन अपनी छोटी छोटी गलतियों के चलते ये चारों अपराध की दुनिया के चक्र में उलझ जाते हैं। चारों चोरों की इसी उलझन की कहानी को बयां करती है फिल्म ‘लूट’। मनोरंजन के लिहाज से पहला भाग बेहद कमजोर और सुस्त है और फिल्म में संगीत भी कमजोर है। फिल्म के पहले भाग में एक गीत है और फिल्म के अंत में राखी सांवत का एक आयटम सांग जरूर रखा गया है।
फिल्म में कमजोर संवादो के चलते गोविंदा के करने के लिए यूं तो कुछ खास नहीं था फिर भी वे अन्य कलाकरों की अपेक्षा बेहतर साबित हुए है। रवि किशन और जावेद जाफरी अपनी छवि के अनुरुप दिखे हैं। प्रेम चोपड़ा फिल्म में डॉन की भूमिका में है लेकिन वे पाकिजा फिल्म के गाने सुनते ही नजर आएं है, बेदम पटकथा के चलते वे अपनी भूमिका में असर नहीं छोड़ पाए है। महाअक्षय, मीका और स्वेता भारद्वाज सामान्य नजर आए हैं वहीं किम शर्मा अपनी छवि के अनुरुप चहकती हुई दिखी है।
इस फिल्म को मल्टीप्लेक्स सिनेमा में दर्शक मिलने की उम्मीद बेहद कम है लेकिन उत्तर भारत में सिंगल स्क्रीन सिनेमा में गोविंदा को देखने दर्शक आ सकते है। फिल्म में नयापन न होने के चलते सिनेमाहाल से निकलता दर्शक अपने आप को ठगा हुआ पाता है। इस फिल्म से फिल्म निर्माताओं को एक बात तो तय है कि पुरानी कहानी पर अगर आप नए अंदाज में फिल्म नहीं बना सकते तो आप बॉक्स ऑफिस पर दर्शक की भीड़ की कल्पना नहीं कर सकते।
राजेश यादव

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