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तीन दिन में देश के 18 जवान शहीद, उधर मीडिया गाता रहा रामदेव धुन

पूरा देश 9 दिन तक बाबा रामदेव के अनशन और सत्याग्रह से अवगत हुआ, एक तरफ अन्ना और बाबा रामदेव अपनी अपनी धुन में लगे थे तो केंद्र सरकार इस दौरान पूरी तरह चिंतित थी, अपना मीडिया भी बाबा रामदेव के सत्याग्रह से निकल रही टीआरपी और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के तीखे शब्दों की भाषा को खूब दिखा रहा था, जो बचा था उसकी कसर उस तथाकथित पत्रकार के जूता मामलें ने कर दी लेकिन क्या पिछले 2 दिनों में इससे ज्यादा बड़ी कोई दूसरी खबर नहीं थी जो लोगों को झकझोरने पर मजबूर करती?


जरा सोचिए क्या आप जो चैनल देख रहे हैं वास्तव में वह सही सूचना दे रहा हैं, जरा उस समाचार पत्र का पहला पन्ना देखिए जिसमें पिछले तीन दिन में कोई बड़ी खबर छूट गई लगती है या नाममात्र को छाप दी गई है


माफ कीजिएगा मैं रामदेव बाबा , अन्ना और सरकार के बयानों की बात नहीं कर रहा हूं, मैं चिंदबरम की उस प्रेस वार्ता की बात भी नहीं कर रहा हूं जिसमें बाबा की हथियार बंद सेना बनाने की बात पर गुस्सा था।तो फिर आखिर क्या हैं जो छूट गया...........




तीन दिन में देश के 18 जवान शहीद, छग में नक्सलियों का तांडव



जी हां यह एक ऐसी खबर है जो वास्तव में हमारी सरकारों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं और यही वह खबर हैं जो ना केवल झकझोरती है बल्कि हमें प्रभावित करती है कम से कम छत्तीसगढ़ के लोगों को और वहां की सरकार को और उन 18 लोगों के परिवार को जो देश के लिए शहीद हो गए, यह वह खबर है जिसे देश की सुरक्षा से जुड़ा हर व्यक्ति पड़ना चाहेगा लेकिन क्या मीडिया ने इस खबर को उतने बड़े अंदाज में बताया..मुझे लगता है नहीं और मुझे यह कहते हुए अफसोस हो रहा है कि हमारा मीडिय अभी भी उतना मजबूत नहीं हुआ है मैं यहां उन समाचार पत्रों से जुड़े लोगों को साधुवाद देना चाहुंगा जिन्होंने लोकल स्तर पर इसकी रिपोटिंग की और इसे गंभीरता के साथ प्रकाशित किया।

जवानों की शहादत पर दैनिक भास्कर के स्टेट एडिटर राजीव सिंह की विशेष टिप्पणी अपने आप में पूरे मामलें की गंभीरत को दिखाती है। टिप्पणी पढ़ने के लिए क्लिक करें लेकिन इस तरह की प्रतिक्रिया कितने समाचार पत्रों और टीवी मीडिया ने दिखाई। कितना अच्छा होता कि जैसे इस मुद्दे की गंभीरता को राजीव सिंह जी ने समझा और उस पर अपनी बेबाक राय दी वैसा ही देश के अन्य पत्रकार भी करते। लेकिन नहीं साहब अब तो बाजारवाद में खबरें खोखली मगर टीआरपी वाली हो तो बात बनेगी वरना उसका कोई मूल्य नहीं हैं यह बेहद हास्यास्पद है कि पूरा मीडिया जगत एक ऐसे योग गुरू को बार बार दिखा रहा है जिसे नक्सलियों तक का समर्थन है और हमारी केंद्र सरकार ऐसे व्यक्ति को एक दिन रामलीला मैदान पर अनशन करने की छूट भी देती है ।



रामदेव भ्रष्टाचार से लड़ने की बात कह रहे हैं, उनको माओवादियों का समर्थन है, तो कोई बाबा को यह क्यों नहीं बताता की बाबा रामदेव जी माओवादियों की सेना ने देश के 18 माओं की खोक सूनी कर दी..क्या टीवी मीडिया में एक भी ऐसा पत्रकार नहीं है जो अपने समाचार में यह बता सके कि देश में दिल्ली से लेकर हरिद्वार तक जब बाबा रामदेव सत्याग्रह कर रहे थे उसी वक्त छत्तीसगढ़ में देश के जवान माओवादियों की सेना से टक्कर ले रहे थे ... 18 शहीद हो गए बाकि मैदान में डटे हुए है..मीडिया भले टीआरपी से चलता हो यह सैनिकों के भल पर सुरक्षित है और जो लोग देश के रक्षकों को भूल जाते हो उनको अपने आप पर सोचना होगा..चौथा स्तंभ का ढोल पीटना और उस जिम्मेदारी को निभाना दो अलग अलग बातें हैं ।



बाबा रामदेव ने जूस पीया, पूरे देश के मीडिया ने देखा पढ़ा और सुना लेकिन क्या आपको पता है तीन दिनों में देश के 18 जवान माओवादियों से लड़ते हुए शहीद हो गए? क्या आपको लगता है हमारा मीडिया उतनी जवाब देही से काम करता है ?

ऐसा लगता है हमारा पूरा का पूरा मीडिया एजेंडा सेटिंग के सिद्धांत में उलझकर रह गया है। आखिर क्यों केवल पॉपुलर न्यूज के लिए हमारा पूरा का पूरा मीडिया एक स्वर में बोल रहा है, क्या देश के 18 जवानों का शहीद हो जाना बड़ी बात नहीं है? गौर करें ये जवान देश के बार्डर पर नहीं वरना आपके देश के अंदर छत्तीसगढ़ के जंगलों में नक्सलियों से लोहा लेते हुए मारे जा रहे हैं? क्या देश के लिए यह बड़ा मुद्दा नहीं है? अगर हैं तो क्यों हमारे मीडिया के दिग्गज उसे प्रमुखता से छापते हैं, अंदर के पन्नों पर सिंगल और डबल कॉलम में न्यूज देकर समाचार पत्र काम चला ले रहे हैं और टीवी न्यूज मीडिया भी 24 घंटो में से 18घंटे तो बाबा रामदेव और अन्ना से जुड़ी खबरें प्रकाशित कर रहा है? यह गलत है और इस तरह का एजेंडा सेटिंग देश के लिए, मॉस मीडिया के लिए बेहद घातक है?
अमेरिका में कुछ लोग मारे जाते हैं तो वहां की सरकार वियतनाम से जंग लड़ने के लिए तैयार हो जाती है और मीडिया का अंदाज भी दूसरा होता है? ईजरायल तो अपने एक आदमी के मारे जाने पर हमलावर अंदाज में बात करता है और हम अपने ही घर में अपने जवान खो रहे हैं लेकिन हमारी सरकार, हमारा मीडिया और हमारा समाज सब के सब बाबा रामदेव और अन्ना हजारे को देख और सुन रहे हैं। सबको अन्ना हजारे और रामदेव में गांधी के अनशन की झलक दिखती है लेकिन नहीं दिखता तो उन सैनिकों की मौत जो आज देश के लिए लड़ते हुए नक्सलियों के हाथों मारे जा रहे हैं। मीडिया इतना कमजोर कैसे हो सकता है?
अन्ना हजारे ने जो मुद्दा उठाया उस पर सरकार से उनकी बात हो रही है, बाबा रामदेव से मिलने भी सरकार खुद चलकर गई तो फिर इतना शोर शराबा क्यों? आखिर उन १८ सैनिकों के बारे में कोई आवाज क्यों नहीं उठाता? ये 18 सैनिक तो पिछले तीन दिन में मारे गए हैं लेकिन अगर पूरे साल का आकड़ा देखें तो देश के लिए शहीद होने वाले जवानों की संख्या 250 से अधिक होगी।



यह एक आवाज है, और अब चुप बैठने का वक्त गया, देश के लिए शहीद होने वालों सैनिकों को नेपथ्य में डालने वाले मीडिया से निपटने के लिए हर अच्छे पत्रकार और पाठक को एक स्वर में बोलना होगा देश से बड़ा कुछ नहीं..ना मीडिया ना बाबा रामदेव ना अन्ना हजारे...



आपकी नजर में आखिर कौन सी बड़ी खबर है


. देश के 18 जवानों का शहीद होना

२. बाबा रामदेव का सत्याग्रह और अन्ना का बार बार
देखिए 2 बातें


. मीडिया एजेंडा :

यह हमारा मीडिया तय कर रहा है जिसमें न्यूज पेपर, टीवी और रेडियो आ रहे हैं
इनकी नजर में पिछले सात दिन में क्या रहा देश का एजेंडा : बाबा रामदेव का अनशन, और अन्ना हजारे

. पब्लिक एजेंडा : देश की जनता तय करती है,
देश के 18 जवानों की शहादत, मीडिया चुप क्यों, सरकार कुछ करती क्यों नहीं



हमें अब पब्लिक एजेंडा बनाना होगा और देश के मीडिया को बताना होगा कि अगर इस देश के आम आदमी के एजेंडे के हिसाब से नहीं चल सकते तो बहिष्कार के लिए तैयार रहो, पाठक की शक्ति को दिखाना होगा, पॉपुलर न्यूज से ज्यादा देश हित की खबरों पर फोकस करना होगा. जब जनता सरकार बना और बिगाड़ सकती हैं तो एजेंडा क्यों नहीं तय कर सकती..एक ऐसा एजेंडा जिस पर चलने के लिए मीडिया और हमारी सरकार दोनों को सोचना पड़े

राजेश यादव























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