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फिल्म समीक्षा : प्यार इंम्पॉसिबल


निर्देशक : जुगल हंसराज
प्रोडच्यूसर : उदय चोपड़ा
लेखन : उदय चोपड़ा
गीत : अंविता दत्त
संगीत : सलीम -सुलेमान
कलाकार : उदय चोपड़ा, प्रियंका चोपड़ा, डिनो मोरिया, अनुपम खेर
बैनर : यशराज
खूबसूरती इनसान को आर्कषित करती है, और अगर कोई खूबसूरत नहीं है तो वह अपने रुप को लेकर कुछ हीनता फील करता है। लेकिन ऐसे इंसान को किसी बेहद खूबसूरत लड़की से प्यार हो जाए तो वह अपने इस प्यार को बताने से डरता है। प्यार इंम्पॉसिबल ऐसे ही प्यार की कहानी कहती है।
कहा जाता है कि वो प्यार ही क्या जिसमें आई लव यू कहना पड़े, लेकिन इसे कहे बिना बात कभी - कभी अधूरी ही रह जाती है, शेष कुछ रह जाता है तो दिल में बसे जज्बात। फिल्म प्यार इॅप्पासिबल सच्चे प्यार की बात करती है। यशराज बैनर के तले बनीं इस फिल्म को किशोरवय पीढ़ी को ध्यान में रखकर बनाया गया है जो कि एक सीधी सच्ची प्यार भरी कहानी है। रोड साइड रोमियों से प्यार इम्पासिबल तक की यात्रा में जुगल हंसराज प्यार में डूबे तो जरूर लेकिन इसमें वो खुमारी नहीं ला पाए है जिसकी उम्मीद खुद उन्होंने या फिल्म के लेखक उदय चोपड़ा ने की होगी। लेकिन फिल्म प्यार के जिस जज्बात को उदय ने अपनी पटकथा में उभारने का प्रयास किया है वह उम्दा है और उदय के इस प्रयास की सराहना करनी चाहिए।


फिल्म में अभय (उदय चोपड़ा )एक ऐसे रोल में जो खूबसूरत आलिशा (प्रियंका चोपड़ा) से प्यार तो करते है लेकिन कह नहीं पाते। कॉलेज लाईफ खत्म होने के सात साल बाद एक दिन अपने चोरी हुए सॉप्टवेयर की तलाश में सिद्धू /वरुण (डिनो मोरिया) को खोजते हुए सिंगापुर चले जाते है। यहां उनकी मुलाकात आलिशा से होती है और अभय को पता चलता है कि इन सात सालों में आलिशा की जिंदगी बदल चुकी है और वह एक तलाकशुदा महिला है जिसकी एक बच्ची तान्या है जो काफी उग्र स्वभाव की है। फिल्म में घटनाक्रम कुछ इस तरह से आगे बढ़ता है कि आलिशा के घर में अभय को नानी (नौकर) बन तान्या की देखभाल करनी पड़ती है। धीरे -धीरे आलिशा को उदय की लाईफ जब पता चलता है तो उसके दिल में अभय के लिए इज्जत बढ़ जाती है। वह उसे प्यार करने लगती है लेकिन इस बीच सिद्धू /वरुण (डिनो मोरिया) जिसने की उदय के सॉप्टवेयर को चोरी से अपने पास रख लिया है के कारण कहानी में मोड़ आता है लेकिन बाद में एक पासवर्ड से उदय को उसका सॉप्टवेयर और आलिशा का प्यार मिल जाता है।


फिल्म का पहला हॉफ कमजोर है लेकिन मध्यांतर के बाद फिल्म में दर्शक की रोचकता बढ़ जाती है और कुछ संवाद बेहद भावनात्मक है। फिल्म का संगीत बेहतर है और गीत के बोल अंविता ने पटकथा और फिल्म के लोकेशन को ध्यान में रखकर लिखी है जो कि उम्दा प्रयास है। फिल्म का विषय पुराना है लेकिन उसको नए अंदाज में बताने का प्रयास किया है जो किशोरवय पीढ़ी को पसंद आ सकता है।
फिल्म को रोमांटिक कॉमेडी बताया जा रहा है लेकिन कॉमेडी के लिहाज से फिल्म बेदम है और प्यार के जज्बातों के लिहाज से बेहतर। कहा जाता है कि हर भारतीय के दिल में एक देवदास होता है और अगर आप भी किसी को प्यार करते है लेकिन दिल की बात जुंबा पर लाने में डरते है तो फिल्म आपको पसंद आएगी।
2.5/5

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