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प्यार के इस खेल में..दो दिलों के मेल में

साधों ईश्वर ने इंसान को दिल नामक जो दौलत दी है उसके कई साइड इफेक्ट है। अच्छा खासा आदमी कब दीवाना हो जाय किसी का कोई भरोसा नहीं। टीवी पर सानिया के दो दीवानों की खबर देखकर अपना दिल भी मन ही मन जार -जार फूंट - फूट कर रोया। यार अपने से अच्छे तो ये कुवारें होने का धर्म निभा रहे है और एक अपना दिल है प्यार के नाम पर विवेकानंद के आदर्शवाद की तरह हो जाता है।

कमबख्त अच्छा खासा दो दिलों का मिलन हो रहा है और इस मोहब्बत में 50 फीसदी का आरक्षण मांगते हुए ये दोनों गा रहे है .तेरा पीछा ना मैं छोड़ूगा सोणिए .भेज दे चाहे जेल में। अमा मियां यह भी कोई बात हुई माना कि आजाद हो पर जाने अनजाने गुलामी की तरफ हाथ बढ़ाते हुए प्यार में डूबने की बात क्यों करते हो?

वैसे भी इश्क कभी खुदा हुआ करता था अब तो बॉलीवुड की फिल्मों ने इश्क को कमीना और कमख्त के नामों से पुकारना शुरु कर दिया है। और तो और जीरो साइज की बॉडी वाली मेहबूबा का दिल जीतने के लिए शरीर पर टैटू ना खुदवाया तो कहां के और कैसे आशिक? प्यार के मापदंड बदल गए है और हर इस भीड़ भरे संसार में प्यार पर वक्त की मार भी कभी फिजा तो कभी मल्लिका के रुप में सामने आई है।


और क अच्छर से प्यार करने वाली टीवी की दुनिया की महारानी ने तो आदमी के दिमाग के केमिकल लोचें को ऐसा बिगाड़ा है की कौन किससे प्यार करता है, किसका दिल किसके लिए धड़कता है, समझ के परे ही चला गया। वाह रे देवी खुद तो क से प्यार कर बैठी और हम रह गए अकेले। प्यार का ऐसा रुप बदला कि हिम्मत ना हुई किसी खूबसूरत और झील सी गहरीं आंखों में डूबने की।

ग्लोबल हवा की बयार में बाबा वेलेंटाइन का खुमार भी बजरंग दलों और श्रीराम रुपी सेना का नाम सुनकर काफूर हो जाता है। अमा - यार अपने से अच्छे तो ये एकतरफा मोहब्बत करने वाले छोरे है बस एक बार का रिस्क प्यार भले ना मिले आशिकों में गिनती तो हो गई।
प्यार की इस मधुर पाठशाला के बारे में सोच ही रहा था की मनोविज्ञान की देवी ने समस्या को ताड़ते हुए कहा अरे ऐसी खबरें अक्सर आया करती है। और यह सब दिमाक के केमिकल लोचे के अंसुतलन से होता है। साधों मनोवैज्ञानिक रुपमति की बात सुनकर अपना दिल धक से किया और बॉलीवुड का वह पुराना गीत याद आया बाबूजी धीरे चलना प्यार में जरा संभलना.हां बड़े धोखे हैं इस राह में।

राजेश यादव

टिप्पणियां

तीसरी आंख ने कहा…
हां बड़े धोखे हैं इस राह में...

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